Some true some just translation but definitely a person who wants recognition as a Kripa yogi
Since some of it is true and from shad chakra nirupana I posted it here
एक क्रिया साधक के पेज से
ॐ श्री परमात्मने नमः
ॐ गुं गुरुभ्यो नमः
षट् चक्र निरूपण में कहा है :-
मेरोर्बाह्यप्रदेशे शशिमिहिरशिरे सव्य दक्षे निषण्णे ।
मध्ये नाड़ी सुषुम्णा त्रितयगुणमयी चंद्र सूर्याग्निरूपा ।
धुस्तुर–स्मेर–पुष्प–ग्रथिततम–वपुः कंद मध्याच्छीरस्था ।
वज्राख्या मेढ्रदेशाच्छीरसि परिगता मध्यमेस्या ज्वलन्ती ।।
“मेरुदंड के बाहर वायें तथा दायें भाग में इडा तथा पिंगला नामी दो नाड़ियाँ हैं और बिच में सुषुम्णा नाम्नी नाडी है जो की सत्त्व , रज और तम आदि त्रिगुणमयी और चंद्र, सूर्य एवं अग्नि के समान देदीप्यमान हैं । प्रष्फुटित धतूरा पुष्प के जेसे शरीर बाली तः सुषुम्णा नाड़ियों के उत्पत्ति स्थान कंद से लेकर मस्तकान्तर्गत सहस्रार पर्यन्त गमन करती हैं । इसके अंदर लिंगमूल स्थान से वज्रा नाम्नी अन्य एक नाड़ी गयी है मस्तक पर्यन्त ।”
तन्मध्ये सा प्रणव विलसिता योगिनाम् योगगम्या ।
लूतातंतुपमेया सकल सरसिजान् मेरुमध्यांतरस्थान् ।
भित्त्वा देदीप्यते तद्ग्रथनरचनया शुद्धबोधस्वरूपा ।
तन्मध्ये ब्रह्मनाडी हरमुखकुहरादादिदेवांतसंस्था ।।
“उस वज्रा नाड़ी के भीतर चित्रिणी नाड़ी है जो की प्रणव के समान प्रकाश वाली और मकड़ी के सूत समान सूक्ष्मता के कारण ध्यान द्वारा योगियों को विदित होती है । वह नाड़ी मेरु मध्य स्थित समस्त कमलों को भेद कर गूंथती हुई और अधिक प्रकाशित कर रही है तथा तथा उसके बिच में शुद्ध ज्ञानरूपी ब्रह्मनाड़ी मूलाधार स्थित स्वयंभू शिव लिंग के मुख से निकल कर मस्तकान्तर्गत सहस्र दल स्थित परमब्रह्म पर्यन्त चली गयी है ।”
इन दोनों श्लोकों को ज्यादा समझाने की जरुरत नहीं ।
कौलिक तंत्र तारा कल्प में कहा गया
“सप्तपद्मं मयैवोक्तं सुषुम्णा ग्रथितं प्रिये ।
अधोवक्त्रादिमान्तश्च न आख्येयं यस्य कस्यचित् ।।”
“है देवी ! मेरे द्वारा कहे गए यह सात पद्म सुषुम्ना द्वारा गुंथे हुए हैं और अधोमुखी हो कर स्थित हैं । यह बात हर किसी को पता नहीं । ”
इन पद्मो को जागृत करके उर्ध्वमुखी करने के लिए सुषुम्ना में प्राणोत्थान की आवश्यकता है जो की केवल अंतर्मुखी कुछ विशिष्ट प्राणक्रिया के द्वारा संभव है और यह गुरु वक्त्र गम्य है ।
इस सुषुम्ना के अंदर चराचर विश्व विद्यमान है और साधारण बुद्धि से अगम्य है । केबल गुरु मुख से साधना प्रणाली सिख कर साधना करने से इस के सारे तत्त्व प्रकाशित होते हैं और बोध गम्य होते हैं ।
मूलाधार से लेकर विशुद्ध तक पंचदेव का निवास है ।
मूलाधार में अग्रपूज्य गणेश , स्वाधिष्ठान में आदिशक्ति माँ दुर्गा , मणिपुर में प्राणों के स्रोत सूर्य , अनाहत में सर्वत्र परिव्याप्त भगवान् नारायण और विशुद्ध में भगवान् शिव का अस्थान हैं । आज्ञा चक्र में इष्टदेव तथा सहस्रदल कमल में परमात्मा का वास है ।
सूक्ष्म शरीर स्थित चक्रों को कमल के फूल के साथ तुलना किया गया है और इनके पंखुड़ियों की संख्या अलग अलग है जो कुछ इस प्रकार है ।
मूलाधार 4
स्वाधिष्ठान 6
मणिपुर 10
अनाहत 12
विशुद्ध 16
आज्ञा 2
सहस्रार 1000
यह पंखुड़ियां सब उस चक्र स्थान की मुख्य प्राणवाहिनी नाड़ियाँ हैं । मूलाधार से आज्ञा तक कुल 50 पंखुड़ी उपस्थित हैं । इन 50 पंखुड़ी में संस्कृत वर्णमाला के 50 वर्ण उपस्थित हैं । विश्वसार तंत्र के अनुसार
“सर्ववर्णात्मकं पत्रं पद्मानां परिकीर्तितं ।
दक्षिणावर्तयोगेन लिखनं चिन्तयेतद्धिया ।।”
अर्थात “यह सारे पद्मों के पंखुड़िया वर्णात्मक हैं अथवा वर्णों से सुसज्जित हैं । और इनकी उपस्थिति लिखते समय दक्षिणावर्त (clock wise) रूप में परिकल्पना करना चाहिए ”
मूलाधार से आज्ञा 50 पंखुड़ी = 50 वर्ण
सहस्रार में यही 50 वर्ण 20 परतों(layer) में होते हैं । इस लिए 50×20=1000 पंखुड़ी का हिसाब बनता है ।
यह सब वर्णों को मातृका वर्ण कहा जाता है । इनकी ध्वनियों को जब वैज्ञानिक रूप से सुसज्जित किया जाता है तो मन्त्र बनते हैं । इसलिए कहा गया “मंत्राणां मातृका देवी….”
अर्थात मन्त्रों में देवी मातृका रूप में विराजती हैं । (देखिये देवी अथर्वशीर्ष)
अभी हम देखेंगे की कौनसे चक्र में कौनसे वर्ण हैं ।
मूलाधार = वं , शं, षं, सं
स्वाधिष्ठान = बं, भं, मं, यं, रं, लं
मणिपुर= डं, ढं, णं, तं, थं, दं, धं, नं, टं, ठं
अनाहत = कं, खं, गं, घं, ङं, चं, छं, जं, झं, ञं, टं, ठं
विशुद्ध = अं, आं, इं, ईं, उं, ऊं ऋं, ऋं (दीर्घ) , लृङं , लृङं (दीर्घ), एं, ऐं, ओं, औं , अँ, अ:
आज्ञा = हं , क्षं
[वि:द्र:- मोबाइल में टाइप बोर्ड में ना होने के कारण दीर्घ ऋ और दीर्घ लृङं को नहीं लिखा जा सका ]
विशुद्ध चक्र में सारे स्वर वर्ण उपस्थित हैं । निचे के बाकि चक्र में बाकि व्यंजन वर्ण । आज्ञा में जो “हं” है वह सारे स्वरवर्ण को प्रतिरूप हे और “क्षं ” ‘क‘ से लेकर ‘स‘ पर्यन्त सारे व्यंजन वर्ण का प्रति रूप है । यह सारे वर्ण ही कुंडलीनी देवी के अलग अलग रूप हैं ।
इन 50 वर्ण देवियाँ हैं और उनके नाम भी हैं । सब नहीं मिल पाये । जितने मिले उनका नाम “अ” से “क्ष” तक क्रम से बताता हूँ ।
ब्रह्माणी,चंडिका,रौद्री,गौरी,इन्द्राणी,कौमारी,वैष्णवी,दुर्गा,नारसिंहिका,कालिका,मुण्डमाला,शिवदूती,परा,वाराही,कौशिकी,माहेश्वरी,शंकरी,जयंती,मंगला,कलिमर्दिनी,पालिका,मेधा,शिवरूपा,शाम्भवी,भीमा,शांता,उग्रा,भ्रामरी,रुद्ररूपिणी,अम्बिका,बहुरूपा,क्षेमा,क्षेमंकरी,धात्रीरूपा,स्वधा,स्वाहा,बह्नि रूपिणी,अपर्णा,माया,घोररूपा,प्रियंबदा,ब्रह्माण्डवाणी,ब्राह्मी
और 6 मातृकाओं का नाम गीता में हे । वह बाद में आलोचना करेंगे । फिर भी एक देवी का नाम छूट रहा है । गुरुकृपा होगी तो वह भी कभी ना कभी ज्ञात हो जाएगी ।
अब हर एक वर्ण के बारे में आलोचना करेंगे ।
में श्लोक नहीं दे रहा । तत्त्वानुसार जो विशेषण प्रयुक्त हुए हैं केवल उन्हें लिख दूंगा । जो शब्द समझ में ना आये बाद में आलोचना करेंगे ।
अ – प्रणव का मूल , शरदिंदु आभा युक्त, पञ्च कोण , त्रिशक्ति युक्त, कैवल्य मूर्ति, प्रकृति स्वरूपा
आ – शंख ज्योतिर्मय आभा , पञ्च प्राणमय , परामकुंडली, ब्रह्म विष्णु रूप एवं साक्षात् रूद्र
इ – कुंडलीनी, परमानन्द, शिवमय, परमब्रह्म, सदानंद, ध्वनि, त्रिगुण शक्ति युक्त
ई – परम कुंडली , पीत सौदामिनी वर्ण, प्राणमय, ज्ञानमय, शब्द ब्रह्म को सृष्टि करने वाली
उ – , अर्ध कुंडली रूप, पीत चम्पक वर्णा , प्राण का स्वरुप, पंचदेव मय, पञ्च प्राणमय तथा चतुर्वर्ग प्रदायक
ऊ – परमदुर्लभ, शंखकुंद सम आकार , परमकुंडली, पंचप्राण मय , पंचदेवमय, त्रिगुणात्मक, पीत सौदामिनी वर्ण युक्त , चतुर्वग तथा सुख प्रदायक
ऋ – कुंडली मूर्तिमान्, त्रिदेव मय, सदाशिव तथा ईश्वर संयुक्त , पञ्च प्राणमय , चतुर्ज्ञान मय, लोहित सौदामिनी वर्ण युक्त
ऋ (दीर्घ)- परम कुंडली, पीत सौदामिनी वर्ण युक्त, पञ्च देव मय, चतुर्ज्ञान मय , पंचप्राण मय, त्रिशक्ति सहित
लृङ् – परमदेवता , व्रह्मादि समस्त देवताओं का वास, पंचदेव मय, चतुर्ज्ञानमय, पंचप्राणमय, पीत सौदामिनी आभा , त्रिगुणात्मक, विंदू त्रयात्मक
लृङ् (दीर्घ)- पूर्णचंद्र समप्रभ , पञ्च देवात्मक, पंचप्राणमय , त्रिगुणात्मक, त्रिविन्दु संयुक्त, चतुर्वर्ग प्रद, परमकुंडली
ए – व्रह्म विष्णु शिवात्मक, पंचदेव मय , पञ्च प्राणमय, विंदू त्रयात्मक, चतुर्वर्ग फल प्रदायक , बन्दूक कुसुम सम आभा
ऐ – परमदिव्य, महाकुण्डलिनी, कोटिचंद्र आभा युक्त, पञ्च प्राणमय
ओ – देवमाता, त्रिगुणात्मक ईश्वर, रक्त वर्ण आभा, प्राणदा
औ – चतुर्वेद मय, चतुर्वर्ग फलप्रद, प्राणमय, शिवमय, रक्ताभा युक्त
अँ– पीत वर्ण, ज्ञानमयी, व्रह्ममयी, प्राणशक्ति संचारिणी
अ: – विसर्ग युक्त, रक्त सौदामिनी आभा युक्त, सर्व ज्ञान मय, आत्मतत्त्व संधान में सहायक
यह 16 वर्ण किशोरावस्था वाली, गीत वादन में तत्पर रहने वाली शिव युवती साक्षात् स्वयं कुंडली ही हैं ।
अब व्यंजन वर्णों के तत्त्वों का आलोचना करेंगे
क – जगत का सार, व्रह्मा विष्णु और शिवात्मक, सर्वकाम प्रद , कैवल्य कला युक्त , क्रियाशक्ति, आत्मविद्या , ज्ञानगर्भ
ख – त्रिकोण शून्य विंदू संयुक्त तथा शंख कुन्द सम आभा युक्त
ग – सर्वदा निर्मल, निरीह, निर्गुण तथा त्रिगुण युक्त, पंचप्राण युक्त तथा अरुण आभा से पूर्ण
घ– चतुष्कोण , पंचदेवमय, सदा शांत , शांति प्रद, सिद्धि प्रद
ङ – कुण्डलिनी मध्यस्थित, सर्वदेवमय, त्रिगुण, पंचप्राण मय
च – त्रिविन्दु तथा त्रिशक्ति युक्त, चतुर्वर्गफलप्रद, परमकुण्डली, योगद , ध्यानद और प्राणद
छ – पीत सौदामिनी आभा युक्त , ईश्वर संयुक्त , त्रिविन्दु शक्ति युक्त , परमकुण्डलिनी
ज– मध्य कुंडली , शरत् चंद्र आभा, त्रिगुण तथा पञ्च प्राणमय
झ – कुंडली मोक्ष रूपिणी , रक्त वर्ण तत्त्व, विंदू युक्त होकर कुण्डलिनी जाग्रत करने वाली
ञ – रक्त वर्ण आभा युक्त, प्राणात्मक, त्रिविन्दु तथा त्रिशक्ति युक्त , तंत्र नियामक
ट – कोटि चंद्र आभा युक्त, त्रिशक्ति त्रिविन्दु और पञ्च प्राण युक्त
ठ – मोक्ष दायिनी कुण्डलिनी, त्रिविन्दु संयुक्त, पंचदेव तथा पञ्च प्राण मय
ड – आत्मतत्त्व समन्विता , चतुर्ज्ञान मय , त्रिशक्ति युक्त
ढ – परम आराध्या , परम कुण्डलिनी, मध्या, शिवशक्ति युक्त , सर्व देवात्मक
ण – परम ईशानी, परम कुण्डलिनी , पीत वर्णा, तत्त्वज्ञान युक्ता , मोक्ष प्रदायिनी
त – आत्म तत्त्व , आदि तत्त्व युक्त , पञ्च प्राण मय, पीत वर्ण, त्रिशक्ति एवं त्रिविन्दु युक्त
थ – कुंडली मोक्ष रूपिणी , त्रिविन्दु पूर्ण, त्रिशक्ति युक्त , अरुण प्रभा , सर्व देवमय
द – त्रिविन्दु युक्त तथा चतुर्वर्ग प्रदायिनी , आत्मादि तत्त्व युक्त परम कुण्डलिनी
ध – पञ्च प्राण मय, हृद भाव, आत्मा तत्त्व युक्त, रक्त वर्ण प्रभा, कुंडली तथा मोक्षदा
न – कोटि सौदामिनी प्रभा युक्त, परम कुण्डलिनी, पञ्च प्राण सुशोभिता
प – त्रिशक्ति युक्त मोक्षद , आत्म तत्त्व युक्त
फ – रक्त सौदामिनी आभा , त्रिगुणात्मक तथा आत्म तत्त्व समाहित
ब – अरुण वर्ण आभा, चतुर्वर्ग दाता, सर्वदेव मय, आत्म शक्ति, पापनाशक
भ – महामोक्षदायिनी, अर्क तेज युक्त , परम कुण्डलिनी
म – पञ्च प्राण मय , पञ्च देव मय, निरंतर कुण्डलिनी के भीतर रहने वाला
य – अव्यय प्रकृति, मोक्ष प्रद , चतुष्कोणाकृति, रक्त सौदामिनी वर्ण , वायु वीज
र – रक्त सौदामिनी वर्ण, प्राणमय, विंदू युक्त, कुण्डलिनी संयुक्त, वह्नि वीज
ल – सब स्थान में सारे प्रकार के रत्न प्रदान करने में सक्षम , धरा वीज
व – सर्व सिद्धि प्रदायक, शक्ति युक्त, विंदू युक्त, चतुर्वर्ग प्रदायक, वरुण वीज
श – व्रह्म विग्रह , अक्षर, त्रिगुण युक्त , श्वास
ष – रक्त चंद्र प्रभा , अष्ट कोणमय , सुधा परिपूर्ण
स– शक्ति तथा वीज स्वरूपिणी , पञ्च प्राणात्मक, कुण्डलिनी
ह – त्रिगुण तथा पञ्च देव मय, परम कुण्डलिनी , पिंगल वर्ण युक्त , सब वर्णों से उत्तम
क्ष – त्रिविन्दु , त्रिशक्ति, प्राणमय, ज्ञानमय
यह 50 मातृका वर्ण मूलधारादि 6 चक्रों में उपस्थित हैं जो पहले बता दिया गया की कौनसा वर्ण कहाँ हे ।
गुरुदेव लाहिरी महाशय प्रदत्त षट् चक्र के चित्र में लिखा हे
“जे अक्षर सहस्रारे आछे ताहई छए चक्रेटेओ आछे ”
जो अक्षर सहस्रार में हे वही 6 चक्रों में है ।अर्थात यह सब सहस्रार में उपस्थित हैं ।
इन वर्णों का वर्णन करना संभब नहीं । गुरु कृपा से इतना हो पाया इसके लिए गुरुवर्गों को नमन ।
अब जैसा कहा गया की सारे वर्ण सहस्रार में हैं । तो एक एक करके वर्णों के तत्त्व का आभास पाने के बाद कल्पना कीजिये सहस्रार में ये सब हैं तो सहस्रार कितना तत्त्व मय तथा गुप्त होगा ।
जब कभी भी हम कोई मंत्र उच्चारण करते हैं मंत्र के शब्दों में उपस्थित मातृका वर्ण पूर्व वर्णित अपने स्थानों में स्पंदित होती हैं । क्यों की यह सब वर्ण पंचप्राण मय हैं और हमने जेसे कल इनके तत्त्वों के वारे में आलोचना की , जब भी मंत्र उच्चारण करते हैं उसमे उपस्थित मातृका वर्णों के तत्त्व भी सुक्ष्म शरीर हैं प्राण प्रवाह के साथ स्पंदित होते हैं । तो उस तत्त्व की जागृति होती हे ।
चक्रों के अलग अलग स्थान में मातृका अनुसार जब स्पंदन होता है यह उसी प्रकार है जेसे कोई Piano वजा रहा हो एक निर्दिष्ट संगीत को ।
उदाहरण के तौर पर एक शब्द को लेते हैं
“कुण्डलिनी”
जब हम यह शब्द उच्चारण करते हैं तो
क उ ण ड ल ई न ई
यह मातृका वर्ण अपने अपने जगह में स्पंदित होते हैं ।
पूरी सुषुम्ना इस प्रकार स्पंदित होती रहती हे जब हम मंत्र उच्चारण करते हैं ।
जेसे रोग हुए हैं तो उसको ठीक करने के लिए किस तत्व के वाद किस तत्त्व को ध्वनि के द्वारा स्पंदित करने से रोग ठीक हो जायेगा , और उसी हिसाब से उन ध्वनियों को जोड़ के एक ध्वन्यात्मक समाहार जब बनता हे तो हम “महामृत्युंजय मंत्र” जेसे चमत्कारी मन्त्रों की सृष्टि होती है । वैज्ञानिक उपाय से यह काम वही कर सकता हे जो इन मातृका वर्णों का ज्ञाता हो और इनमे पूर्ण सिद्धि की प्राप्ति किया हो ।
पुराने समय में ऋषि इसी प्रकार प्राण के स्पंदन को अनुभव करके तत् सम्बन्धीय ध्वनियों को ध्यान की उच्च अवस्था में सुन के उनको सुसज्जित करके मंत्रो के माध्यम में प्रकट किया करते थे और लोगों तक पहंचाते थे ।
यह विज्ञान मंत्र पाठ करने से स्वयं उसके स्पंदन को अनुभव करके की पता लगाया जा सकता है । इसको वर्णन करना उतना आसान नहीं । फिर भी जितना हो सका गुरुकृपा से मेने संकेत के माध्यम से बताने की कोशिस की ।
मंत्र जब बार बार उच्चारण किये जाते हैं एक निर्दिष्ट संख्या में तो मातृका अनुसार वो सारे तत्त्व भी वार वार स्पंदित होके चैतन्य हो जाते हैं । इसी को मंत्र की जागृति कहते हैं और बोलते हैं की मंत्र सिद्ध हो गया । जब मंत्र सिद्ध होता है , उसका ध्वनि और प्राण के स्पंदन में एक ताल मेल बैठ जाता है । प्राण मंत्र मय और मंत्र प्राण मय हो जाता है । और साधक मंत्र के द्वारा असाध्य साधन करने में सक्षम होता है ।
इसको लिखते रहने से खत्म नहीं होगा क्यों की यह हे ही इतना रहस्यमयी ।
इतना लिखके विराम देता हूँ ।
षट् चक्र के कमलों के 50 पंखुड़ियों में 50 मातृकाओं के वारे में हमने आलोचना किया । हमने देखा की यह सब पंखुड़ियां प्राणमय हैं । प्राणवायु को मुख्यतः 7 भागों में विभक्त किया गया है ।
प्रवह
संवह
विवह
उद्वह
आवह
परावह
परिवह
ये वायु पुनः प्रत्येक सात भागों में विभक्त हैं । तो अंतःस्थ ब्रह्माण्ड में इनकी संख्या 7×7=49 बनती हे ।
मूलाधार से आज्ञा तक ५० पंखुड़ी । मूलाधार से विशुद्ध तक 48 पंखुड़ी में 48 वायु और आज्ञा के 2 पंखुड़ी में एक वायु । तो कुल 50 पंखुड़ी में 49 वायु उपस्थित हैं ।
आज्ञा चक्र से मूलाधार तक क्रम में उनका नाम “योगिराज श्यामाचरण लाहिरी प्रदत्त षट् चक्र के चित्र” के अनुसार लिख रहा हूँ ।
आज्ञा से मूलाधार तक नाम :-
श्वशिनी
विहग (उड्डीयमान)
नभश्वर (नभश्चर)
प्राण
मातरिश्वा
जगत्प्राण
पवमान
नभप्राण
हवि (यह मोक्ष देता हे)
सारं
स्तंभन
श्वसन
सदागति
पृषदश्व
गंधवाह
वाह
भोगिकान्त
व्यान
गंधवह
आसुग
मारुत
पवन
फणिप्रिय
निश्वासक
उदान
अनिल
समीरण
अशुष्ण
सुवाष
वाति
अक्षति
प्रकम्पण
समान
मरुत
नभश्वान
धुनिध्वज (धुलिध्वज)
कम्पलक्ष्मा
वास
मृगवाहन
चंचल
पृषतांपति
अपान
स्पर्शन
वात
प्रभंजन
अजगतप्राण
आवक
समीर
प्रकम्पन
जिस चित्र की बात लिखी है वह “God talks with Arjuna” पुस्तक
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